अभिवादन को दूर छोड़िये, नज़रे भी तो मिली नहीं। मेरे देश की राजनीति में, यह तो शुभ सन्देश नहीं।

Yuva Perspectives
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अक्सर एक उद्धरण हम पढ़ते हैं की अगर आपके पास किसी को देने के लिए कुछ भी नहीं है तो भी आप कुछ तो दे ही सकते हैं और वह है सम्मान।

आज एक घटना का ज़िक्र हर तरफ है कि देश के दो सबसे बड़े नेता अमित शाह और राहुल गाँधी आमने सामने आये और आँखें भी नहीं मिलायी। इस घटना से केवल यही प्रतीत होता है की राजनीति की प्रतिद्वंदता ने देश की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों के सबसे बड़े नेताओं को इतना दूर कर दिया है की उन्होनें एक दुसरे का अभिवादन करना भी उचित नहीं समझा। यह कदापि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं है।

भारतवर्ष की राजनीति में राजनेताओं के बीच कितनी भी दूरियां पैदा हो जाएं इस बात की परंपरा हमेशा से रही है की एक दूसरे का अभिवादन बड़ी गर्मजोशी से किया जाता रहा है। श्री योगी आदित्यनाथ जी की ताजपोशी पर श्री अखिलेश यादव जी का मोदी जी से मिलना, त्रिपुरा में नवनियुक्त मुख्यमंत्री श्री बिप्लब कुमार देब का ताजपोशी के दिन भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री माणिक सरकार जी के पैर छूकर आशीर्वाद लेना आदि तमाम ऐसे उदहारण हैं जो इस देश के युवाओं को हमेशा याद दिलाते रहते हैं की हम क्यों विश्वगुरु हैं। यह छोटी छोटी बातें हमारे संस्कारों को पूरे विश्व के सामने रखती हैं और युवाओं को अपनी संस्कृति व परम्पराओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

आज की घटना हृदय विदारक इसलिए रही क्योंकि अमित शाह जी से उम्र में छोटे होने के कारण सभी की राहुल गाँधी जी से यह अपेक्षा थी कि वह उनका बड़ी गर्मजोशी से अभिवादन करेंगे। वीडियो को गौर से देखें तो लगेगा कि जैसे अमित शाह बाहें फ़ैलाने वाले हों पर राहुल जी ने उनकी ओर देखना भी उचित नहीं समझा।

क्या इस मुश्किल वक़्त में देश की सबसे पुरानी पार्टियों में से एक, कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष इसी तरह युवाओं को राजनीति में आने के लिए प्रोत्साहित कर पाएंगे? क्या इसी तरह से कांग्रेस देश की राजनीति में पुनः मुख्यधारा में आ पायेगी? अपने विचार हमसे साझा करें।

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